हसदेव अरण्य आंदोलन क्या है और यह कहां चल रहा है, और इसे चिपको आंदोलन से क्यों जोड़ा जाता है?

छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य को बचाने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। जिसमें जंगलों से पेड़ों की कटाई का विरोध है।

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य जंगल को काटे जाने का विरोध धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। हसदेव अरण्य जंगल, जो तीन राज्यों की सीमा पर है, को बचाने के लिए बुद्धिजीवी और पर्यावरण प्रेमी भी इस अभियान में शामिल हो गए हैं। 1 लाख 70 हजार हेक्टेयर में फैले वन क्षेत्र में कोयले का भंडार मिला है, जिसे केंद्र सरकार ने वन माइनिंग के लिए निलामी कर दिया है।

ऐसे में खनन कंपनी ने खदान की नीलामी होते ही काम शुरू कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि खदान के लिए पेड़ों की इतनी बली ली गई है कि पूरा क्षेत्र एक जंगल से मैदान में बदल गया है। ये कटाई लगभग दस साल से जारी है। कांग्रेस की सरकार में भी खदान का विरोध हुआ था, लेकिन पेड़ों की कटाई नहीं रुकी, और ग्रामीण अब बीजेपी सरकार में इसका विरोध कर रहे हैं।

हसदेव अरण्य आंदोलन क्या है?

वास्तव में, हसदेव अरण्य में कोयला भंडार है2021 में वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट दी कि हसदेव अरण्य में 10 हजार लोग गोंड, लोहार और ओरांव आदिवासी जाति से आते हैं। इसके अलावा, यहां 167 वनस्पतियां, 82 पक्षी और दुर्लभ प्रजाति की तितलियां हैं। जिनमें से 18 वनस्पतियां खत्म होने के कगार पर हैं। साथ ही, हसदेव नदी इस क्षेत्र में बहती है और हसदेव जंगल इसी नदी के आसपास है। यही कारण है कि इस जंगल को मध्य भारत का फेफड़ा भी कहा जाता है। इसलिए अगर इस पूरे जंगल को काट दिया जाए तो लोगों को जल्दी ही बहुत नुकसान हो सकता है। इसके चलते, यहां परसा ईस्ट केते बासेन खदान बनाया जाएगा। 1 लाख 70 हजार हेक्टेयर में से 137 एकड़ जंगल क्षेत्र में पेड़ काट दिए गए हैं। यही कारण है कि ग्रामीण इस जंगल को काटने का विरोध कर रहे हैं। यहां 9 लाख पेड़ों की कटाई की जानी है, जिसके बाद 23 कोल ब्लॉक बनाए जाएंगे, सूत्रों ने बताया। ग्रामीणों ने पिछले दो वर्षों से पेड़ों की कटाई के खिलाफ आंदोलन चलाया है। जिसकी तुलना पेड़ों को बचाने वाले चिपको आंदोलन से की जाती है। ग्रामीण इस जंगल को बचाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

2021 में वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट दी कि हसदेव अरण्य में 10 हजार लोग गोंड, लोहार और ओरांव आदिवासी जाति से आते हैं। इसके अलावा, यहां 167 वनस्पतियां, 82 पक्षी और दुर्लभ प्रजाति की तितलियां हैं। जिनमें से 18 वनस्पतियां खत्म होने के कगार पर हैं। साथ ही, हसदेव नदी इस क्षेत्र में बहती है और हसदेव जंगल इसी नदी के आसपास है। यही कारण है कि इस जंगल को मध्य भारत का फेफड़ा भी कहा जाता है। इसलिए अगर इस पूरे जंगल को काट दिया जाए तो लोगों को जल्दी ही बहुत नुकसान हो सकता है।

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